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संपादकीय

“वन नेशन वन इलेक्शन”: भारत में चुनाव सुधार की बड़ी पहल या लोकतंत्र के लिए खतरा?

Last updated: फ़रवरी 27, 2026 11:07 अपराह्न
Sharma M K
8 Min Read
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“वन नेशन वन इलेक्शन” (ONOE) भारत में एक बड़ा राजनीतिक और चुनावी सुधार का प्रस्ताव है, जो पूरे देश में एक ही समय पर लोकसभा, राज्य विधानसभा, नगरपालिका और पंचायत चुनावों को आयोजित करने की वकालत करता है। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार का एक महत्वपूर्ण चुनावी वादा माना जा रहा है, जो 2024 के चुनावों से पहले एक नई दिशा प्रदान कर सकता है। ONOE का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को सरल बनाना, खर्च को कम करना और सरकार के कामकाज में सुधार लाना है। हालांकि, इसका विरोध भी कम नहीं है, और कई राजनीतिक दलों का मानना है कि यह कदम भारतीय संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा हो सकता है।

Highlights
  • क्या भारत में एक साथ चुनाव कारगर होंगे?
  • चुनावी चक्रों को समन्वित करना
  • वन नेशन वन इलेक्शन से संभावित लाभ
  • विपक्ष की चिंताएँ
  • लागत बचत का तर्क
  • सामने आने वाली चुनौतियाँ

क्या भारत में एक साथ चुनाव कारगर होंगे?

वन नेशन, वन इलेक्शन का विचार भारत के चुनावी ढांचे में बड़ा बदलाव ला सकता है। इस पहल का उद्देश्य देशभर में एक ही समय पर सभी स्तरों के चुनावों का आयोजन करना है, जिससे चुनावी प्रक्रिया में सुधार हो सके और व्यय में कमी लाई जा सके। यह प्रस्ताव वर्तमान प्रणाली की जगह लेगा, जहां लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने संबोधन में ONOE को लागू करने की प्रतिबद्धता दोहराई, और सभी राजनीतिक दलों से इसे वास्तविकता बनाने की अपील की।


चुनावी चक्रों को समन्वित करना

हाल ही में, ONOE पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट द्वारा स्वीकृत की गई। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित एक उच्च स्तरीय समिति ने यह रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों के चुनावी चक्रों को समन्वित करने की सिफारिश की गई है।

  • पहला कदम: रिपोर्ट के अनुसार, पहले चरण में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित किए जाएंगे।
  • दूसरा चरण: पहले चरण के 100 दिनों के भीतर सभी स्थानीय निकाय चुनाव (ग्रामीण और शहरी) कराए जाएंगे।
  • निष्पादन समूह की स्थापना: रिपोर्ट ने ONOE की सिफारिशों को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए एक कार्यान्वयन समूह की स्थापना का भी सुझाव दिया है।

वन नेशन - वन इलेक्शन

वन नेशन वन इलेक्शन से संभावित लाभ

ONOE के समर्थक इस प्रणाली के कई सकारात्मक पहलुओं पर जोर देते हैं, जिनमें से प्रमुख हैं:

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  • खर्च में कमी: एक साथ चुनाव कराने से व्यय में भारी कमी हो सकती है, क्योंकि अलग-अलग समय पर चुनाव कराने के लिए भारी लागत लगती है।
  • बेहतर शासन: लगातार चुनाव होने से सरकार के कामकाज में बाधा आती है। ONOE से प्रशासनिक कार्य और शासन की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।
  • वोटर थकान में कमी: बार-बार चुनाव होने से मतदाता भी थकान महसूस करते हैं। एक साथ चुनाव कराने से वोटर थकान कम होगी और मतदान प्रतिशत में वृद्धि होगी।
  • स्थानीय मुद्दों पर ध्यान: ONOE से विधायक और जनप्रतिनिधि अपने निर्वाचन क्षेत्रों के स्थानीय मुद्दों पर बेहतर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे, क्योंकि वे बार-बार चुनावी अभियान में नहीं उलझेंगे।

विपक्ष की चिंताएँ

ONOE के विरोधियों का मानना है कि यह प्रणाली भारतीय संघीय ढांचे और लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकती है।

  • संघीयता का उल्लंघन: विरोधियों का कहना है कि ONOE संघीयता की भावना के खिलाफ है। भारत एक संघीय देश है, जहां राज्यों के पास अपनी स्वतंत्र चुनाव प्रक्रिया होती है। ONOE से यह संतुलन बिगड़ सकता है।
  • राष्ट्रवादी पहचान का बढ़ावा: आलोचक यह भी मानते हैं कि ONOE का उद्देश्य हिंदू-राष्ट्रवादी पहचान को बढ़ावा देना है, जिससे केंद्रीय सरकार को और अधिक शक्ति मिल सकती है।
  • क्षेत्रीय मुद्दों का दबाव: क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का कहना है कि ONOE से राष्ट्रीय मुद्दे क्षेत्रीय मुद्दों पर हावी हो जाएंगे, जिससे राज्यों के स्थानीय मुद्दों की अनदेखी होगी।
  • लोकतांत्रिक जवाबदेही में कमी: विरोधियों का यह भी मानना है कि ONOE से लोकतांत्रिक जवाबदेही में कमी आ सकती है, क्योंकि एक साथ चुनाव कराने से क्षेत्रीय आकांक्षाओं को पूरी तरह से महत्व नहीं मिलेगा।

लागत बचत का तर्क

ONOE के समर्थक इस बात पर जोर देते हैं कि चुनावी खर्च को कम करने के लिए यह प्रणाली जरूरी है।

  • वर्तमान व्यवस्था में चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं, जिससे सरकार और राजनीतिक दलों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। ONOE के तहत, सभी चुनाव एक साथ कराने से यह खर्च कम किया जा सकता है।
  • हालांकि, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने इस बात पर सवाल उठाए हैं कि ONOE के लिए आवश्यक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें (EVMs) और वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल्स (VVPATs) की तीन गुना संख्या को जुटाना लॉजिस्टिकल चुनौती हो सकती है।
  • कुरैशी का यह भी मानना है कि चुनावी खर्च को बेहतर ढंग से राजनीतिक वित्त सुधारों के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता है, और ONOE प्रणाली के साथ कई व्यावहारिक कठिनाइयाँ जुड़ी हुई हैं।

सामने आने वाली चुनौतियाँ

हालांकि ONOE का विचार सैद्धांतिक रूप से मजबूत हो सकता है, लेकिन इसके क्रियान्वयन के लिए कई चुनौतियाँ हैं:

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  • संसद में बहुमत: ONOE के कार्यान्वयन के लिए भारतीय संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी, जिसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए।
  • NDA की स्थिति: हालांकि एनडीए सरकार को दोनों सदनों में साधारण बहुमत प्राप्त है, लेकिन उसे दो-तिहाई बहुमत के लिए 50 से अधिक वोट की कमी है, जिससे इस प्रस्ताव को पास करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
  • सभी राज्यों की मंजूरी: ONOE को लागू करने के लिए सभी राज्यों और संघ शासित प्रदेशों की मंजूरी आवश्यक है, जो वर्तमान राजनीतिक विभाजन के चलते एक बड़ी चुनौती हो सकती है।

वन नेशन – वन इलेक्शन भारत में चुनाव सुधार का एक महत्वाकांक्षी प्रस्ताव है, जो राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्थाओं में बड़े बदलाव ला सकता है। इसके समर्थक इसे खर्च में कमी, बेहतर शासन और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सुधार के रूप में देखते हैं, जबकि विरोधी इसे संघीय ढांचे और लोकतंत्र के लिए खतरा मानते हैं।

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ONOE का भविष्य भारतीय संसद में होने वाली गहन बहस और राजनीतिक दलों के समर्थन पर निर्भर करेगा। हालांकि यह प्रणाली भारत के चुनावी परिदृश्य को पूरी तरह बदलने का वादा करती है, लेकिन इसके कार्यान्वयन में कई विधायी और राजनीतिक चुनौतियाँ हैं, जिन्हें सरकार को दूर करना होगा।


टैग्स: वन नेशन वन इलेक्शन, भारतीय चुनाव सुधार, नरेंद्र मोदी चुनावी वादा, संघीयता और लोकतंत्र, चुनावी खर्च

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