सुप्रीम फैसलाः बेटियां भी बेटों की ही तरह पैतृक संपत्ति की हकदार

भारत का सुप्रीम कोर्ट
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आम मत | नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अगर पिता की मौत 9 सितंबर 2005 से पहले हुई है तो बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में बराबरी का हक है। सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून 1956 पर यह निर्णय दिया।

यह कानून 1956 में लागू होता था, जिसमें 2005 में संशोधन किया गया था। इसमें बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में भागीदार बनाया गया था। इस कानून पर तब से ही सवाल उठ रहे थे। इनमें से प्रमुख सवाल यह था कि यदि पिता की मौत 2005 से पहले हुई है तो भी क्या बेटी को पैतृक संपत्ति में अधिकार मिलेगा?

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इस पर सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की दो बैंचों ने अलग-अलग फैसले सुनाए थे। इस वजह से भ्रम की स्थिति थी। अब इस मामले में जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुआई वाली तीन जजों की बैंच ने मंगलवार को जो फैसला सुनाया, वह सब पर लागू होगा।

यह था मामला

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2016 और 2018 में दो फैसले सुनाए थे। ये फैसले 2016 में प्रकाश-फूलवती और वर्ष 2018 में दानम्मा-अमर के मामले में सुनाए गए थे। वर्ष 2016 में जस्टिस अनिल आर. दवे और जस्टिस एके गोयल की पीठ ने फैसला सुनाया था।

इसमें पीठ ने कहा था कि 9 सितंबर 2005 को जीवित भागीदार पैतृक संपत्ति का हकदार होगा। वहीं, 2018 के फैसले में जस्टिस एके गोयल और जस्टिस अशोक भूषण की बेंच ने कहा था कि पिता की मौत 2001 में हुई है तो भी दोनों बेटियां संपत्ति में हकदार हैं।

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