प्रणब दा की किताब में खुलासाः मोदी ने अपनाई शासन की निरंकुश शैली

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आम मत | नई दिल्ली

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब द प्रेसिडेंशियल ईयर्स अगले साल जनवरी में आएगी। रूपा पब्लिकेशन से प्रकाशित होने जा रही यह किताब प्रणब दा की यादों की चौथी किस्त है। इस संस्करण में प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल में दो सियासी विरोधी प्रधानमंत्रियों मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के साथ रिश्तों को किया।

उन्होंने लिखा है कि उन्होंने दो बिल्कुल अलग प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया। उन्होंने लिखा कि मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में शासन की निरंकुश शैली अपनाई। इससे न्यायपालिका और विधायिका से सरकार के रिश्तों में कड़वाहट आ गई। उन्होंने लिखा कि सरकार के दूसरे कार्यकाल में ऐसे मामलों पर समझ बेहतर हुई या नहीं, यह तो समय बताएगा।

वहीं, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में उन्होंने लिखा कि डॉ. सिंह गठबंधन को सहेजने के बारे में सोचते थे। इसका असर सरकार पर भी दिखता था। अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने यही किया।

मेरे राष्ट्रपति बनते ही कांग्रेस की लीडरशिप ने खोया पॉलिटिकल फोकस

किताब में पूर्व राष्ट्रपति ने कांग्रेस के बारे में भी सख्त टिप्पणियां की। इस पार्टी के वे पांच दशक से ज्यादा वक्त तक सीनियर लीडर रहे थे। वह पार्टी के उन नेताओं की बातों का खुलकर खंडन करते हैं, जो यह मानते थे कि 2004 में प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बने होते तो पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव में बुरी हार से बच जाती। प्रणब मुखर्जी कहते हैं कि मुझे लगता है कि मेरे राष्ट्रपति बनने के बाद पार्टी की लीडरशिप ने पॉलिटिकल फोकस खो दिया। जब सोनिया गांधी पार्टी के मामले नहीं संभाल पा रही थीं, तब सदन में मनमोहन सिंह की लंबे समय तक गैरमौजूदगी ने अन्य सांसदों के साथ व्यक्तिगत संपर्क खत्म कर दिए।

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