International Women’s Day: क्यों जरूरत है किसी महिला दिवस की?

International Women's Day
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आम मत | जयपुर

डॉ. टीना शर्मा

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (International Women’s Day), ये क्या बात हुई। आप लोग सोच रहे होंगे ये कैसी महिला जो खुद ऐसी बात कह रही है। तो जनाब अपनी सोच पर लगाम लगाइए। मैं ये कहना चाहती हूं कि एक और जहां रोज बलात्कार, आत्महत्या, हत्या, दहेज प्रताड़ना जैसी खबरों से अखबारों के पन्ने अटे पड़े रहते हैं। जहां महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की बातें सिर्फ हवा-हवाई ही होती हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (International Women’s Day) मनाने का क्या औचित्य है? इस एक दिन बसों में टिकट फ्री करना, विभिन्न सरकारी और निजी संगठनों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं को पुरस्कृत करने भर से ही महिला दिवस मनाकर इतिश्री कर लेना कितना सही है?

अब आप सोचने लगे होंगे कि मैं पुरुषों पर आक्षेप लगाने वाली हूं तो फिर से यही कहूंगी कि आपके दिमाग के घोड़ों को थोड़ी देर भगाना बंद कीजिए। ये आर्टिकल पढ़िए और फिर ठंडे दिमाग से सोचिएगा कि क्या गलत है और क्या सही।

महिला दिवस (International Women’s Day) को लेकर कई बातें होती हैं, मैं ऐसी कई चीजों पर हर रोज गौर करती रहती हूं। शायद आपने भी ऐसी चीजों पर गौर किया हो। महिला दिवस पर कॉलेजों से लेकर बड़े स्तर तक कार्यक्रम आयोजित कराए जाते हैं। महिलाओं को बुलाकर या दूसरे शब्दों में कहें तो पकड़-पकड़ कर सम्मानित किया जाता है। इस एक दिन के बाद क्या इन महिलाओं को सम्मान नहीं मिलना चाहिए? सिर्फ एक दिन के लिए ही इस प्रकार की चीजें होना काफी है?

(International Women’s Day) एक महिला जो पूरा दिन घर के कामों में खटती है, सुबह जल्दी उठकर चूल्हे-चौके में लगती है और रात तक इन्हीं सब कामों में लगी रहती है। उसे पति या सास-ससुर से छोटी-मोटी बहस होने पर ये ही सुनने को मिलता है कि वह दिनभर करती ही क्या है। पति का सबसे पसंदीदा डायलॉग होता है मैं सारा दिन ऑफिस में रहता हूं, तुम्हें घर में करना ही क्या होता है। बेचारे पतिदेव, उन्हें ये पता ही नहीं कि घर का काम भी एक तरह की फुल टाइम जॉब है, जिसे करना उनके बस की बात नहीं है। अगर महिला ऑफिस भी जाती है तो कहने ही क्या। उसे ऑफिस से आकर घर के काम भी करने होते हैं। पति महाराज, टेबल पर पैर फैलाकर या तो मोबाइल में लगे होंगे या टीवी में। क्या एक महिला चाहे वह गृहिणी है या कामकाजी, वह ही घर का काम करेगी ये जरूरी है? पुरुष घर के काम में महिलाओं का हाथ बंटाने में खुद को कम क्यों समझते हैं। इससे उनकी शान को कैसा बट्टा लगेगा।

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International Women’s Day फोटो प्रतीकात्मक

लोग कहते हैं कि महिला पुरुषों से कम नहीं होती। कई लोग ये भी कहते हैं कि महिला को बराबरी का दर्जा देना चाहिए। किस बात की बराबरी का दर्जा, पुरुषों को ये मानना होगा कि वे एक महिला से कभी भी बराबरी नहीं कर सकते हैं। महिला ही एक मकान को घर का दर्जा देती है, वह घर और बाहर सभी जगह को अच्छी तरह से मैनेज कर लेती है।

(International Women’s Day) इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि विश्व की अधिकांश सभ्यताएं मातृ सत्तात्मक थी। यानी घर से लेकर बाहर तक के मामलों में महिलाएं निर्णय लेती थी। भारत के भी इतिहास पर भी नजर दौड़ाएं तो पता चलेगा कि विभिन्न दौर में महिलाओं को बेहद सम्मान प्राप्त था और निर्णय लेने की शक्ति भी प्राप्त थी। पुराने समय में स्वयंवर की प्रथा होती थी, जिसमें युवती अपने इच्छा के अनुसार वर चुनती थी। हालांकि, उस काल में उन पर बिलकुल अत्याचार नहीं होता था। ये कहना सौ फीसदी झूठ होगा।

हर दौर में महिलाओं पर अत्याचार हुए हैं। शारीरिक बनावट के आधार पर पुरुष महिलाओं से ज्यादा ताकतवर होता है। ऐसे में वह अपने बाहुबल का सही इस्तेमाल नहीं करता था और ना ही करता है। कानून से भले ही महिलाओं को कई अधिकार मिल गए हैं, लेकिन बावजूद इसके ये सब तब तक चलता रहेगा, जब तक हम अपनी सोच नहीं बदलेंगी।

अगर लड़की शॉर्ट स्कर्ट पहन कर बाहर चली जाए तो आज भी मध्यम वर्ग के माता-पिता उसे डांटने लगते हैं। उसे यह समझाने की कोशिश की जाती है कि अगर वह इस प्रकार की ड्रेस पहन कर देर तक घर से बाहर रहेगी तो लड़के उसे छेड़ेंगे। उसके साथ कुछ गलत भी हो सकता है। लड़की के देर रात तक घर से बाहर रहने या पार्टी आदि करने को भी गलत बताया जाता है। यही सब चीजें अगर लड़का करता है तो उस पर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं लगाई जाती। ये सोच अब थोड़ी-थोड़ी बदलने लगी है, फिर भी यह उस स्तर तक नहीं पहुंची है जिसके लिए कह सकें कि इससे समाज में बदलाव आएगा।

(International Women’s Day) वहीं, महिलाएं अभी भी खुद पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज नहीं उठाती हैं। महज 10 फीसदी महिलाएं ही पुलिस में शिकायत करती हैं। कई परिवार इज्जत, जान का खतरा आदि के चलते शिकायत या तो करते नहीं हैं और अगर कर देते हैं तो डर के कारण वापस ले लेते हैं। ऐसे में अत्याचार करने वाले लोगों का हौसला और बढ़ता है। वहीं, घरेलू अत्याचारों पर महिलाएं अपनी आवाज दबा लेती हैं।

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एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा के मामलों में 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई। ये वे आंकड़े हैं, जिनमें पुलिस में मामला दर्ज कराया गया है। हर रोज एक ना एक बलात्कार का मामला अखबारों में देखने को मिल जाता है। नाबालिग हो या 60 साल की महिला, वहशी दरिंदे किसी को भी अपनी हवस का शिकार बनाने से बाज नहीं आते। कानूनी दांव पेचों का सहारा लेकर ये अपराधी अपनी सजा को लंबे समय तक टाल देते हैं। साथ ही, कई बार तो बाहर ही मामले को रफा दफा करा लिया जाता है। इससे ऐसा जुर्म करने वाले लोगों में कानून का भी भय नहीं रह जाता। वे ऐसा अपराध करने में हिचकते भी नहीं है। ऐसे ही ना जाने कितने विचार दिमाग में आ रहे हैं, कई आपके दिमाग में भी चल रहे होंगे।

क्या आपको अब भी लगता है कि एक दिन के महिला दिवस(International Women’s Day) से समाज में बदलाव आ जाएगा? क्या एक दिन महिलाओं को सम्मान देकर उन्हें 364 दिन तक सम्मान नहीं दिया जाए तो चलेगा ? क्या महिलाएं किसी अहसान या दया की मोहताज हैं ? मैं सौ फीसदी पक्के तौर पर कह सकती हूं कि आपकी नजर में भी इन सभी प्रश्नों का जवाब ना में ही होगा। तो फिर एक दिन महिला दिवस (International Women’s Day) किस काम का। घर की ही नहीं बाहर की भी महिलाओं को सम्मान देकर क्यों ना हर रोज महिला दिवस सेलिब्रेट किया जाए। जब तक महिलाओं के मन से असुरक्षा की भावना खत्म नहीं होगी। तब तक इस प्रकार के महिला दिवस सिर्फ कागजी ही रहेंगे। जिस दिन महिलाओं को घर या बाहर कहीं भी असुरक्षा की भावना नहीं रही। वही दिन असली महिला दिवस (International Women’s Day) होगा, तभी हम कह पाएंगे कि हमने सही मायनों में महिला दिवस मनाया है।

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