द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को तो लक्ष्मी ने राजा बलि को बांधी थी राखी

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– प्रीति शास्त्री

राखी का त्योहार कब और कैसे शुरू हुआ था। इसकी सही और सटीक जानकारी किसी के पास उपलब्ध नहीं है। वहीं, अलग-अलग पुराणों में इसके मनाए जाने के लिए कई कथाएं मिलती हैं। इनमें से कुछ कथाओं से हम आपको बताने जा रहे हैं।

इंद्राणी ने इंद्र को बांधा था रक्षासूत्र

राखी का त्योहार कब शुरू हुआ यह कोई नहीं जानता, लेकिन भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देव-दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नज़र आने लगे। देवताओं के राजा इंद्र घबरा कर बृहस्पति के पास पहुंचे। वहां बैठी इंद्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके पति के हाथ पर बांध दिया।

संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। लोगों का विश्वास है कि इंद्र इस लड़ाई में इसी धागे की मंत्र शक्ति से ही विजयी हुए थे। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है। यह धागा धन, शक्ति, हर्ष और विजय देने में पूरी तरह समर्थ माना जाता है।

श्रीकृष्ण की घायल ऊंगली पर द्रौपदी ने बांधा था साड़ी का टुकड़ा

महाभारत में कृष्ण और द्रौपदी की कहानी है, जिसमें युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण की उंगली घायल हो गई थी। इस पर द्रौपदी ने साड़ी में से एक टुकड़ा बांध दिया था। इस पर भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को संकट में सहायता करने का वचन दिया था।

एक बार जब कौरव और पांडव ध्रूत क्रीड़ा खेल रहे थे, तब युधिष्ठिर ने द्रौपदी को दांव पर लगा दिया था। इस खेल में पांडवों की हार हुई थी, जिसके कारण कौरव द्रौपदी पर अपना हक मान बैठे थे। दुर्योधन ने दुशासन से द्रौपदी को बाल से घसीटकर राजसभा में लाने के लिए कहा था। इसके बाद वे राजसभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करने लगे।

इस दौरान द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को याद कर इज्जत बचाने की प्रार्थना की। भगवान श्रीकृष्ण ने चीर को इतना लंबा कर दिया कि कौरव चाहकर भी द्रौपदी को निर्वस्त्र नहीं कर पाए। ऐसे श्रीकृष्ण ने अपने दिए गए वचन का पालन कर रक्षासूत्र का मान रखा।

लक्ष्मीजी ने भगवान विष्णु को छुड़ाने के लिए राजा बलि को बांधी थी राखी

स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबन्धन का प्रसंग मिलता है। कथा कुछ इस प्रकार है- दानवों के राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे। गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी।

भगवान ने तीन पग में आकाश-पाताल और धरती नापकर बलि को रसातल में भेज दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा बलि राजा के अभिमान को चकनाचूर कर देने के कारण यह त्योहार बलेव नाम से भी प्रसिद्ध है। कहते हैं रसातल में जाने के बाद बलि ने अपनी भक्ति से भगवान को प्रसन्न कर लिया। उसने भगवान से अपने समक्ष रहने का वचन लिया।

लंबे समय तक जब भगवान विष्णु घर नहीं लौटे तो माता लक्ष्मी परेशना हो गई। उन्होंने देवर्षि नारद से उपाय पूछा। इस पर नारदजी ने उन्हें उपाय बताया। इसके अनुसार, लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधकर भाई बनाया और पति भगवान को अपने साथ ले आईं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। विष्णु पुराण के एक प्रसंग में कहा गया है कि श्रावण की पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिए फिर से प्राप्त किया था। हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है।

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