मेडिकल हिस्ट्री नहीं बताने पर बीमा कंपनी को दावा खारिज करने का हकः शीर्ष कोर्ट

भारत का सुप्रीम कोर्ट
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आम मत | नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इंश्योरेंस से जुड़े मामले पर अहम फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बैंच ने कहा कि बीमा का अनुबंध भरोसे पर टिका होता है। अगर कोई व्यक्ति बीमा लेना चाहता है तो उसका यह फर्ज बनता है कि वह सभी तथ्यों का खुलासा करे, ताकि बीमा कंपनी सभी जोखिमों पर विचार कर सके।

कोर्ट ने यह भी कहा कि बीमा फॉर्म में पुरानी बीमारी के बारे में बताने का कॉलम होता है। इससे कंपनी व्यक्ति के बारे में जोखिम का अंदाजा लगा सकती है। अगर व्यक्ति पुरानी बीमारी से जुड़ी सही जानकारी नहीं देता है तो बीमा कंपनी को हक है कि वह दावा खारिज कर सकती है।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के एक फैसले को रद्द कर दिया।

यह था मामला

मामले के अनुसार, मृतक ने अगस्त 2014 में बीमा कराया था। व्यक्ति ने मेडिकल हिस्ट्री के बारे में नहीं बताया था। साथ ही, पूर्व में अस्पताल में भर्ती होने की भी जानकारी नहीं दी थी। इस आधार पर बीमा पॉलिसी इश्यू कर दी गई। व्यक्ति की सितंबर 2014 में मौत हो गई। इसके बाद मेडिकल क्लेम के लिए दावा किया गया।

कंपनी ने यह दावा खारिज कर दिया तो मृतक की मां ने एनसीडीआरसी में केस दर्ज किया। 6 साल बाद इसी वर्ष मार्च में एनसीडीआरसी ने मृतक की मां को ब्याज सहित क्लेम की राशि देने का फैसला सुनाया। इस पर बीमा कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया। इस पूरे मामले पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया।

साथ ही, कोर्ट ने पाया कि मृतक की मां की उम्र 70 साल है और वह मृतक पर आश्रित थी। इसलिए उन्होंने आदेश दिया कि बीमा कंपनी इस रकम की रिकवरी नहीं करेगी।

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