मुसलमानों के बहुविवाह कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर

भारत का सुप्रीम कोर्ट
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आम मत | नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट में मुसलमानों को बहुविवाह की इजाजत देने वाले कानूनी प्रावधानों को चुनौती दी गई। याचिका में मुस्लिम पर्सनल ला (शरीयत) अप्लीकेशन एक्ट 1937 की धारा 2 को रद्द करने की मांग की गई। इस धारा के अंतर्गत मुसलमानों को बहुविवाह करने की इजाजत मिलती है।

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याचिका के मांग की गई कि सुप्रीम कोर्ट बहुविवाह को अतार्किक, महिलाओं के साथ भेदभाव पूर्ण और अनुच्छेद 14 तथा 15(1) का उल्लंघन घोषित करे। याचिका में कहा गया कि धर्म के आधार पर दंड के प्रावधान भिन्न नहीं हो सकते।

वकील हरिशंकर जैन और विष्णु शंकर जैन के जरिए यह याचिका जनउद्घोष संस्थान और 5 महिलाओं ने दाखिल की है। याचिका में कहा गया कि कानून के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति पति या पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करता है तो वह शादी शून्य मानी जाएगी और ऐसी शादी करने वाले को 7 साल तक की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती है।

इस धारा के मुताबिक पति पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करना दंडनीय अपराध है और दूसरी शादी शून्य मानी जाती है। इसका मतलब है कि दूसरी शादी की मान्यता पर्सनल ला पर आधारित है। कहा गया है कि हिन्दू, ईसाई और पारसी कानून में बहुविवाह की इजाजत नहीं है जबकि मुसलमानों में चार शादियों तक की इजाजत है।

कहा गया कि अगर हिन्दू, ईसाई या पारसी जीवनसाथी के रहते दूसरी शादी करते हैं तो आईपीसी की धारा 494 में दंडनीय है जबकि मुसलमान का दूसरी शादी करना दंडनीय नहीं है। ऐसे में आइपीसी की धारा 494 धर्म के आधार पर भेदभाव करती है जो कि संविधान के अनुच्छेद 14 व 15(1) के तहत मिले बराबरी के अधिकार का उल्लंघन है।

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