जयपुरः 9 लाख में खरीदी 2 लाख की रोटरी, 2 कमेटियों ने माना गलत तीसरी बोली-सही

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– राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान में चल रहा ये कैसा खेल!

आम मत | हरीश गुप्ता

जयपुर। श्रीकर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर के राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुरा ने दो लाख कीमत का रोटरी टिलर (यंत्र) करीब नौ लाख में खरीद लिया। इसकी शिकायत के बाद गठित दो कमेटियों ने गबन ही माना, तीसरी कमेटी ने टेंडर प्रक्रिया उचित मानते हुए मामला रफा-दफा कर दिया।

जानकारी के मुताबिक रारी दुर्गापुरा को कृषि से संबंधित एक यंत्र की जरूरत थी। 2016 में इसके लिए टेंडर मांगे गए। टेंडर में यंत्र का नाम बदलकर राॅ क्रॉप वीडर के नाम से निकाला गया। इसकी खरीद करीब 9 लाख रुपए में की गई। यंत्र यहां आया तो यंत्र रोटरी टिलर जैसा था। रोटरी टिलर इंडियन मेड था और उसकी कीमत मात्र दो लाख रुपए के करीब थी।

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जानकारी के मुताबिक इसकी शिकायत किसी ने प्रधानमंत्री से लेकर कई जगह की। प्रधानमंत्री कार्यालय से जांच के आदेश आने के बाद एक जांच कमेटी बिठाई गई। जांच कमेटी ने जांच में पाया कि रोटरी टिलर करीब 2 लाख तक आ जाता, जबकि राॅ क्रॉप वीडर 9 लाख के करीब का आया है, यंत्र भी बिल्कुल वही है।

तत्काल उद्यानिकी विभाग के प्रोफेसर मुखर्जी की भूमिका पर उठे सवाल

मात्र यंत्र के नाम में बदलाव है, क्योंकि यंत्र इटली की फोरीगो कंपनी का है। इस खेल में रारी के तत्काल उद्यानिकी विभाग के प्रोफेसर डॉ. एस. मुखर्जी की भूमिका पर सवाल खड़े हो गए। इसके साथ ही विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति नरेंद्र सिंह राठौड़ और रारी के तत्कालीन निदेशक डॉ. स्वरूप सिंह की भूमिका भी संदेह के दायरे में आ गई थी।

गड़बड़ी शुरू से ही

इस टेंडर की शुरुआत ही ‘खेल’ से हुई। टेंडर मांगा गया उसके अगले ही दिन इस कंपनी का टेंडर प्राप्त हो गया था, जबकि उसका ऑफिस मुंबई में था। तत्कालीन वीसी का कार्यकाल पूरा होने वाला था इसलिए उनकी अप्रूवल के लिए भेजी गई डाक पर डिस्पैच नंबर पुराना डाला गया था।

कमेटी बदली तो राय भी बदली

इस मामले की पहली कमेटी ने रेट पर आपत्ति की थी। पेमेंट रोकने की भी सिफारिश की थी। दूसरी कमेटी ने भी यंत्र को रोटरी टिलर माना था। आरोपियों को बचाने के लिए तीसरी कमेटी बनी। तीसरी कमेटी यंत्र और उसकी रेट तो भूल गई, टेंडर प्रक्रिया को सही मान मामला खत्म कर दिया। सबसे बड़ी बात यह है कि एक श्रीमान दो कमेटियों में थे। पहले राय अलग थी बाद में बदल दी।

आरोपों के बाद भी प्रमोशन

उधर सबसे बड़ा खेल विश्वविद्यालय प्रशासन ने किया। डॉ. एस. मुखर्जी पर आरोप लगने के बाद भी तत्कालीन वीसी ने मुखर्जी को पहले परीक्षा नियंत्रक और बाद में रजिस्ट्रार के पद पर बिठा दिया। बाद के वीसी जेपी शर्मा और जेएस संधू ने भी प्रमोशन दे दिया, जिससे जांच पर आंच ना आए।

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